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Chronic Fatigue Syndrome: रोजाना की थकान हो सकती है इस लाइलाज सिंड्रोम का लक्षण, ऐसे करें बचाव

Chronic Fatigue Syndrome: रोजाना की थकान हो सकती है इस लाइलाज सिंड्रोम का लक्षण, ऐसे करें बचाव


नई दिल्‍ली. सामान्‍य जीवन में थोड़ा सा व्‍यायाम करने, चलने या कुछ काम करने के बाद थक जाना एक सामान्‍य प्रक्रिया है लेकिन अगर यह आपके साथ अक्‍सर हो रहा है तो सावधान होने की जरूरत है. आपको जानकर आश्‍चर्य होगा लेकिन थकान या फेटीग महसूस करना किसी लाइलाज बीमारी का लक्षण भी हो सकता है. खास बात है कि यह समस्‍या सबसे ज्‍यादा महिलाओं को होती है. ऐसे में दिनभर दफ्तर या घर के काम करने के बाद होने वाली थकान को सामान्‍य समझती हैं और इसके बाद के लक्षणों को नजरअंदाज करती हैं तो परेशानी बढ़ती चली जाती है और महिलाएं क्रॉनिक फेटीग सिन्‍ड्रोम (Chronic fatigue syndrome) की शिकार हो जाती हैं. सीएफएस को मायलजिक इंसेफेलाइटिस (myalgic encephalomyelitis) भी कहते हैं. वहीं जब यह बीमारी ज्‍यादा बढ़ जाती है तो इसे फाइब्रोमाइल्जिया के नाम से भी जाना जाता है.

जानी मानी साइकोलॉजिस्‍ट डॉ. निशा खन्‍ना न्‍यूज 18 हिंदी से बातचीत में बताती हैं कि सीएफएस या एमई किसी भी उम्र और महिला पुरुष या बच्‍चों में हो सकती है लेकिन इससे सबसे ज्‍यादा प्रभावित 20 से 40 साल की महिलाएं होती हैं. इसकी एक वजह भारत में महिलाओं की जीवनशैली भी है. इस बीमारी के जो भी लक्षण हैं वे सामान्‍य तौर पर भी लोगों में नजर आते हैं लेकिन यहां समझने की जरूरत है कि जब कोई परेशानी लंबे समय यानि लगभग 6 महीने तक रहती है और सामान्‍य जीवन और रूटीन को बाधित करने लगती है तो उस स्थिति में यह क्रॉनिक फेटीग सिन्‍ड्रोम हो सकता है और डॉक्‍टर के पास जाने की जरूरत है.

क्‍या है क्रॉनिक फेटीग सिन्‍ड्रोम
जब किसी को रोजाना अत्‍यधिक थकान महसूस होती है और उसके साथ कई अन्‍य लक्षण जैसे नींद का न आना, दर्द, तनाव आदि लंबे समय तक रहता और रोजमर्रा के काम करना मुश्किल हो जाता है तो ये बीमारी सीएफएस यानि क्रॉनिक फेटीग सिन्‍ड्रोम हो सकती है. यह बीमारी सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से ज्‍यादा प्रभावित करती है. सबसे बड़ी बात है कि लोग इससे जूझते रहते हैं लेकिन वे इसकी पहचान नहीं कर पाते और इसे सामान्‍य थकान मानते रहते हैं.

ये हैं इस सिन्‍ड्रोम के लक्षण
.हर वक्‍त थकान महसूस करना.
नींद न आना या बीच बीच में नींद का टूटना
. सिरदर्द, मांसपेशियों या जोड़ों का दर्द का रहना
. गले की ग्रंथियों का सूज जाना, गले में दर्द रहना
. शारीरिक या मानसिक व्‍यायाम के बाद बहुत ज्‍यादा थकान महसूस होना.
. कन्‍फ्यूजन होना, याददाश्त कमजोर होना, एकाग्र न हो पाना या ध्यान केंद्रित करने की समस्या
. वायरल या फ्लू के लक्षण होना.
. चक्कर आना, उल्टियां आना
. कुछ काम करने का मन न करना, चिड़चिड़ा रहना

ये हो सकते हैं कारण
डॉ. निशा खन्‍ना बताती हैं कि
. कई बार इन्‍फेक्‍शन होने, महिलाओं में खासतौर पर विटामिन डी की कमी या थॉइराइड की वजह से भी ये बीमारी हो सकती है.
. रात को देर से सोना, सुबह जल्‍दी उठना, पूरे दिन काम पर लगे रहना, चिड़चिड़ाने से भी धीरे-धीरे ये बीमारी पनपने लगती है.
. खुद की देखभाल न करना, खुद पर ध्‍यान न देना, मानसिक रूप से दवाब में रहना, तनाव होना आदि की वजह से भी ये बीमारी हो सकती है.
.इमोशनल स्‍ट्रैस, बीमारियों को लेकर ज्‍यादा बात करते रहने, बहुत ज्‍यादा सोचना भी इस बीमारी के लिए जिम्‍मेदार हो सकता है.
.हार्मोन असंतुलन, निमोनिया, भावनात्‍मक सदमा, घरेलू हिंसा या किसी घटना का शिकार होने, इम्‍यून सिस्‍टम का कमजोर होना आदि की वजह से भी ये बीमारी हो सकती है.

ये करें बचाव के उपाय
डॉ. निशा खन्‍ना कहती हैं कि सबसे पहले तो लोगों को ये जानने की जरूरत है कि अगर कोई भी मुश्किल या परेशानी लगातार आपके साथ बनी हुई है और बढ़ती ही जा रही है तो यह सामान्‍य जीवन का हिस्‍सा तो नहीं हो सकती. ये कोई न कोई बीमारी है और क्रॉनिक है. चूंकि ये बीमारी ऐसी है कि यह मानसिक और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी दिक्‍कतों, दोनों की वजह से हो सकती है, लिहाजा इससे बचाव के लिए खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखना जरूरी है. इसके लिए रोजाना व्‍यायाम करें, लोगों से बातें करें. खुद में आ रहे बदलावों पर ध्‍यान दें और अगर वे बढ़ते हुए या जीवनशैली को प्रभावित करते हुए दिखाई दें तो तुरंत किसी स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ से संपर्क करें. लंबे समय तक चल रही थकान को सामान्‍य न मानें. अगर आप इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं तो काउंसिलिंग का सहारा लें. थेरेपी और मेडिकेशन भी इसके लक्षणों के इलाज में राहत दे सकते हैं.

Tags: Mental diseases, Mental health



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