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मसल्स की कमजोरी का मिलेगा बेहतर इलाज, लैब में ह्यूमन मसल्स सेल विकसित करने का खोजा तरीका – स्टडी

मसल्स की कमजोरी का मिलेगा बेहतर इलाज, लैब में ह्यूमन मसल्स सेल विकसित करने का खोजा तरीका - स्टडी


आजकल के बदलते लाइफस्टाइल की वजह से मसल्स में कई तरह की समस्याएं पैदा हो जाती हैं. थोड़े समय बाद ही मांसपेशियां कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं और उसके बाद जिंदगी बड़ी मुश्किलों भरी हो जाती है. कई बार तो ऐसा होता है कि उम्र से पहले ही हम बूढ़े दिखने लगते हैं. मसल्स से जुड़ी ऐसी ही परेशानियों से निजात पाने की कोशिश में जापान की तोहोकु यूनिवर्सिटी (Tohoku University) से रिसर्चर्स की टीम ने अपनी ताजा स्टडी में ह्यूमन मसल्स के सेल्स विकसित करने के लिए सिंपल लैब बेस्ड सिस्टम (simple-lab-based system) विकसित किया है. ये मसल्स काफी हद तक सिकुड़ने में सक्षम हैं. रिसर्च टीम ने इस मॉडल का यूज ‘स्पोरैडिक इन्क्लूजन बॉडी मिटोसिस (sporadic inclusion body mitosis) यानी एसआईबीएम (sIBM) से पीड़ित मरीजों की मसल्स के गुणों की जांच करने के लिए किया है. आपको बता दें कि एसआईबीएम (sIBM) एक अपक्षयी (Degenerative) बीमारी है, जिसमें मसल्स धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है. इस रोग से आमतौर पर 50 साल से ज्यादा उम्र के लोग प्रभावित होते हैं और इसमें उनकी उंगलियों और घटनों की मसल्स पर असर होता है.

एक्सरसाइज के टाइम एसआईबीएम (sIBM) के मरीजों की मसल्स किस प्रकार से काम करती है, इस प्रयोग से ये समझने में आसानी होगी और रोगों का बेहतर इलाज भी खोजा जा सकेगा. इस स्टडी का निष्कर्ष ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports)’ जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

कैसे हुई स्टडी 
इस स्टडी के लिए ‘इन विट्रो एक्सरसाइज मॉडल्स (In vitro exercise models)’ का प्रयोग किया गया है, जिसमें पेट्री डिश (petri dish) में मसल्स के लंबे सेल्स विकसित किए गए, जिसे मायोट्यूब्स (Myotubes) कहते हैं. उसमें सिकुड़ाव को प्रेरित करने और उनका असर देखने के लिए इलेक्ट्रिकल पल्स दिया गया. हालांकि, इन मॉडलों का यूज सीमित ही होता है. मानव मायोट्यूब्स (Human Myotubes) पर्याप्त तौर पर नहीं सिकुड़ती है, क्योंकि वे आकार में फ्लैट यानी चपटी होती है और जिस मैटीरियल में विकसित की जाती है, उससे मजबूती से जुड़ी होती है. इसकी तुलना में अन्य प्रजातियों, जैसे चूहों की मायोट्यूब्स उन्हीं स्थितियों में अधिक मजबूती से सिकुड़ती है.

क्या कहते हैं जानकार
तोहोकु यूनिवर्सिटी में ग्रैजुएट स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग (Graduate School of Biomedical Engineering) में एसोसिएट प्रोफेसर मकोतो कंजाकिओ (Makoto Kanzaki) ने बताया कि हमने एक नया मॉडल विकसित किया है, जो न सिर्फ मसल्स के मौलिक अनुसंधान में मददगार होगा, बल्कि इसका इस्तेमाल रोगियों से लिए गए बायोप्सी (biopsy) सैंपल की जांच के लिए भी किया जा सकता है, जिसके लिए अभी बहुत ही सीमित संसाधन है. मानव बायोट्यूब्स को विकसित करने में मदद के या उसे बढ़ावा देने के लिए रिसर्चर्स ने चूहों से ली गई कोशिकाओं (Cells) का इस्तेमाल कर पोषण वाले कनेक्टिव टिश्यू की आबादी बढ़ाई.

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चूहों की इन कोशिकाओं को फीडर सेल्स कहते हैं, जो मानव कोशिकाओं को बढ़ावा देने के लिए जरूरी प्रोटीन की आपूर्ति करता है. रिसर्चर्स ने पाया कि चूहों के फीडर सेल्स के बिना मान मायोट्यूब्स में विद्युतीय प्रभाव (इलेक्ट्रिकल स्टिम्यलैशन) में भी बहुत कम सिकुड़न होती है, लेकिन जब एक बार चूहों के सेल्स दे दिए जाते हैं, तो मानव मायोट्यूब्स में इलेक्ट्रिकल स्टिम्यूलेशन से स्वाभाविक सिकुड़न पैदा होता है.

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एसआईबीएम रोगियों से लिए गए मसल्स सेल्स के गुणों के टेस्ट के लिए रिसर्चर्स ने विभिन्न प्रकार के इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया ताकि मानव की स्वस्थ कोशिकाओं से उसकी तुलना की जा सके. उन्होंने पाया कि एसआईबीएम मायोट्यूब्स के गुण मौलिक तौर पर सामान्य मायोट्यूब्स जैसे ही थे. दोनों में ही इलेक्ट्रिकल स्टिम्यलैशन से सिकुड़ाव आया. इससे पता चला कि मसल्स के फाइबर संरचना का विकास हुआ, जिसे सारकोमेयर कहते हैं और उससे कंकालीय मांसपेशी प्रोटीन मायोकाइन का स्तर बढ़ा.

Tags: Health, Health News, Lifestyle



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